गुजरात में बच्चों की बिक्री रैकेट: रंग और जेंडर के आधार पर मूल्य निर्धारण

गुजरात के अहमदाबाद में बच्चों की तस्करी के बड़े रैकेट का पर्दाफाश। गोरे बच्चों की कीमत ₹7 लाख और सांवले बच्चों की ₹2-3 लाख तय की जाती थी।

गुजरात में बच्चों की बिक्री रैकेट: रंग और जेंडर के आधार पर मूल्य निर्धारण

अहमदाबाद: गुजरात पुलिस ने एक बड़े अंतर-राज्य चाइल्ड ट्रैफिकिंग (बच्चों की तस्करी) रैकेट का पर्दाफाश किया है, जिसमें नवजात शिशुओं को बेचा और खरीदा जा रहा था। जांच में बताया गया कि बच्चों की कीमत उनके त्वचा के रंग और लिंग के आधार पर तय की जाती थी — यह एक गंभीर और सोचनीय मामला है जिसने कानून-व्यवस्था और समाज के संवेदनशील मुद्दों को उजागर किया है।

 रैकेट का ढांचा

पुलिस की शुरुआती जांच के अनुसार, यह एक संगठित नेटवर्क था, जिसमें गुज़रात के गरीब और कमजोर परिवारों से बच्चे खरीदे जाते थे और उन्हें दूसरे राज्यों में खरीदारों के पास बेचा जाता था। जांच टीम का कहना है कि उनके पास पर्याप्त सबूत हैं कि यह कारोबार कई लेयरों में संचालित होता था।


त्वचा के रंग और लिंग के अनुसार कीमत

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि बच्चों की “बाजार कीमत” उनके त्वचा के रंग और लिंग के अनुसार तय होती थी:

  • गोरे रंग (फेयर) के शिशु: ₹6-7 लाख तक बिकते थे।

  • सांवले या गहरे रंग के शिशु: ₹2-3 लाख के बीच बेचे जाते थे।

  • लड़कों की कीमत: लड़कों को आमतौर पर लड़की के मुकाबले अधिक कीमत पर बेचा जाता था।

  • लड़कियों की कीमत: ₹1.5-2 लाख के बीच।

यह भेदभाव दर्शाता है कि कैसे समाज में गोरेपन और पुरुष लिंग को मूल्यवान मानने वाली मानसिकता भी इस गैर-कानूनी नेटवर्क का हिस्सा बन गई थी।


 कैसे पकड़ में आया रैकेट?

29 जनवरी को पुलिस को खुफिया जानकारी मिली कि एक नवजात बच्चे को हिम्मतनगर से हैदराबाद ले जाया जा रहा है। अहमदाबाद एयरपोर्ट के पास एक गाड़ी को रोकने पर एक नवजात शिशु मिला और मौके पर चार लोग गिरफ़्तार किए गए।

गिरफ्तार किए गए आरोपी हैं:
वंदना पंचाल (34) — अहमदाबाद
सुमित यादव (27) — अहमदाबाद
मौलिक दवे (32) — अहमदाबाद
रोशन अग्रवाल (42) — हैदराबाद
— जिन्होंने पुलिस के सामने बच्चे को ₹3.6 लाख में खरीदा हुआ स्वीकार किया।


तस्करी का नेटवर्क — कैसे काम करता था?

पुलिस और जांच अधिकारी बताते हैं कि यह कोई छोटा सा मामला नहीं था:

  • रैकेट अक्सर कमजोर परिवारों से बच्चों को खरीदता था।

  • बच्चे को इंटर-स्टेट एजेंट्स के जरिए राज्य सीमाओं के पार भेजा जाता था।

  • कई बार बच्चों के जैतून-जन्म, दुर्दशा या गरीबी के कारण परिवार उन्हें बेचने के लिए मजबूर होते थे।

  • आरोपी IVF क्लीनिक्स और कनेक्शनों के जरिए बिना बच्चों वाले दंपत्तियों से संपर्क करते थे, जो बच्चे की मांग करते थे।

पुलिस उक्त नेटवर्क में शामिल पैसे के लेन-देन, संपर्क नेटवर्क, और राज्य के बाहर एजेंट्स से जुड़े डेटा की गहन पड़ताल कर रही है।


 जिस नवजात बच्चे को बचाया गया…

पुलिस ने नवजात शिशु को जब्त कर मेडिकल केयर में रखा है। बच्चे की वास्तविक पहचान और उसके जैविक माता-पिता की तलाश जारी है, ताकि उसे सुरक्षित और वैध रूप से परिवार से जोड़ा जा सके।


 समाज पर प्रभाव और चिंता

यह मामला केवल एक आपराधिक गिरोह का खुलासा नहीं है — यह समाज में गहरी मनोवैज्ञानिक और सांस्कृतिक मान्यताओं को भी उजागर करता है:

  • त्वचा के रंग के आधार पर बच्चों को मूल्य देना जातीय और सामाजिक पूर्वाग्रह को दर्शाता है।

  • लिंग का भेदभाव भी आर्थिक रूप से बच्चों की कारोबारिक कीमतों में देखा गया।

ऐसे मामलों से स्पष्ट होता है कि केवल कानून ही नहीं बल्कि शिक्षा, सामाजिक संवेदनशीलता और जागरूकता भी महत्वपूर्ण हैं।